
कभी कभी मैं सोचता हूँ की क्या बेहतर है .....
दुनियादारी के नाम पर अपने उसूलों को बेच के जिंदा रहना या सच्चाई,इमानदारी,न्याय के लिए पूरी दुनिया से लड़ते लड़ते एक दिन ख़त्म हो जाना ।
बचपन से लेकर आज तक जो कुछ पढ़ के सीखा वो सब तो स्कूल खत्म होते ही खत्म होता सा लगता है...
सच क्या है ???
वो जो पहले पढ़ा या वो जो अब दुनिया के स्कूल में होता हुआ दिखता है ।

हर चीज बिकती सी दिखायी देती है,जिसके पास ताक़त है ,जो बलवान है ,वोह सब कुछ कर सकता है ।
हर चीज सच कर सकता है । मैं देखता हूँ जब सीमा पे जाते सिपाहियों को जो बस एक देशभक्ति के जज़्बात की खातिर अपनी ज़िन्दगी तक की परवाह नही करते ,और दूसरी तरफ़ हमारे देश के नेता जो अपनी ज़िन्दगी के लिए किसी जज्बे की परवाह नही करते ।

उनके लिए क्या कोई उसूल है भी ?
कौन सही है ???
क्या किसी के पास वक्त भी है ये सोचने का की हम क्या कर रहे हैं और क्यूँ कर रहे हैं ??
किसी की शहादत पे भी राजनीति करते नेता ??
या सबसे जल्दी खबरें दिखा के देशभक्ति करते अनगिनत चैनल ??
किसी राज्य में लोगों को मार के भगाते ही लोग ?
या जाति के नाम पे आपस में आजतक लड़ते लोग?
या दहेज़ क नाम पे मासूम लड़कियों को मारता हुआ हमारा समाज ?
चोरी करते और नाम कमाते नामी उद्योगपति ?
और न जाने क्या क्या ??
शायद इनमें से कोई नही सोचता कुछ भी, सिवा अपने झूठे उसूलों को बेच के पैसा कमाने के ।
पर हम में से कोई भी इन्हे गाली देता है तो वो भी ग़लत है क्यूंकि गन्दगी में रहते रहते हूँ भी उस गन्दगी का ही एक हिस्सा बन चुके हैं . समाज किसी देश की दिशा निर्धारित करता है और समाज बनाते हैं मैं,आप और हम सब।
हम हमेशा सोचते हैं की कोई मसीहा आएगा और हमें इन सब मुश्किलन से बचा लेगा । पर हम में से कोई भी जो ग़लत होता है उसे रोक के सही करने की कोशिश के बारे में सोचता तक नही है । अगर कोई गलती से सोच भी लेता है तो उसका दिमाग उसे कहता है की मत करो ,इससे तुम्हारा नुक्सान होगा । अगर एक आदमी सही काम करना भी चाहे तो १००० लोग उसे रोकने के लिए पहले ही खड़े होते हैं ।
रास्ते में मरते हुएय आदमी को उठाते ही हमें इस चीज का डर लगता है की पुलिस में सवाल जवाब कौन करेगा ,मरने दो ... पर जब कोई हमारे घर का ऐसे फंस जाए तो हमें सारे इंसानियत के सारे सिद्धांत याद हो जाते हैं जबानी ।

१५ अगस्त और २६ जनवरी को तो हमें सब भारतवासी भाई नजर आते हैं,पर जब भी हमारे पड़ोस में कुछ अनहोनी हो जाए तो हमारे पास वक्त नही होता ,बस औपचारिकता करने कोई लिए चले जायेंगे ये सोच कर सास बहू देखने में लगे रहते हैं की मिहिर की तीसरी शादी आने वाली है आज ।
हमारा समाज असल में एक उस भीड़ का नाम हो गया है जो बस खड़े होके तमाशा देख सकती है,कुछ कर नही सकती किसी के लिए नियम और कायदे क़ानून बता सकती है । जो सही करता है उसे हमारा ही समाज निगल जाता है ,समाज की भलाई के नाम पे । ये समाज के लिए ख़तरा है ,वोह समाज में अच्छा नही माना जायेगा ।
हम सब खोखले हो चुके हैं । बस एक झूठ की चादर से अपने अन्दर की आवाज को जिंदा रहने कोई लिए खत्म कर देते हैं । बेच चुके हैं आपने ही हाथों अपने उसूलों को क्यूंकि हमें जिंदा रहना ज्यादा अच्छा लगता है बजाये उन उसूलों के लिए दर्द सहना । गांधीजी के ३ बंदरो से भी ज्यादा अच्छे बन्दर बन चुके हैं हम , न कुछ दिखाई देता है ,न कुछ सुनाई देता है ,और न ही कोई आवाज आती है हमारे अन्दर से हो रहे समाज के प्रदूषण से के लिए कुछ कहने की..... अगर गलती से कोई आवाज आ भी जाए तो उसे हमेशा कोई लिए अपने सीने में दफ़न कर देते हैं जिंदा रहने की कीमत समझ कर।
येही है हमारे आज का सच ...हमारी ज़िन्दगी का सच जो सबको पता है पर कोई भी मानना नही चाहता । हमारे अन्दर इंसान जैसा कुछ बचा ही नही है। बस जंगल के सियारों सी हालत है सभी की...सबके रंग भले ही अलग अलग हो गए हैं पर चमड़ी के अन्दर सब एक जैसे ही हैं ।

जब तक झूठ और ग़लतफ़हमियों में रहना बंद नही करेंगे हमारा ऊधार असंभव है ,क्यूंकि जब भगवान् ने इंसान को बनाया तब उसने इंसान को सबसे कीमती चीज दी ,वोह था उसका दिमाग । जग लोग सही सोच के चुप बैठ बैठना बाद कर देंगे और कुछ करने लगेंगे उस दिन इस समाज,देश और दुनिया को उसकी सही दिशा मिल जायेगी ,अन्यथा दुनिया बारूदी विनाश के ढेर पे खड़ी है,बस एक आग लगाने वाला उल्लू चाहिए जो कहीं न कहीं से आ ही जायेगा एक दिन इस दुनिया को आग लगा के ख़ाक करने कोई लिए ।
3 comments:
its wonderful dear
Hum sabhi ye sochte hain but jis tarah tumne ise poem me convert ki hai. its really gud.
its really nice bhaiya, poori sachaai likhi hai ....
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